उस प्रलयंकारी विहान में,
खड़ा था मैं
एक मूक पाषाण सा,
जहाँ मेरी करुणा,
मेरा चिर-संचित भ्रातृ-स्नेह
और उस श्मशान की धधकती चिता
एक ही त्रिवेणी में विलीन हो रहे थे।
तुम वहाँ थी
अग्नि की उन स्वर्ण-रश्मियों के झुरमुट में,
बिल्कुल वैसी ही,
जैसी स्मृति के प्रथम वातायन में खिली थी!
अधरों पर वही चिर-परिचित मृदु हास,
और नयनों में वही मौन उलाहना
मानो पूछ रही हो,
"क्या इस महायात्रा में तुम संग न चलोगे?"
तुम्हारी उस निस्तब्धता में एक अलौकिक तृप्ति थी,
जैसे आत्मा को अंततः अपनी मरु-मरीचिका का तट मिल गया हो।
तटिनी की शीतल लहरों ने मेरे चरण पखारे,
मानो जल के अक्षरों में कोई निगूढ़ प्रश्न अंकित किया हो
"क्या तुमने मोह के समस्त पाश काट दिए हैं?"
और मैंने मस्तक झुका दिया
हाँ! तुम्हारे रक्षा-सूत्र की वह अंतिम ऊष्मा,
तुम्हारी निश्छल हंसी की वह स्वर्णिम धूप,
सब कुछ इस चिता की प्रदीप्त ज्वाला को सौंप आया हूँ।
तुम स्थिर थी वहाँ
जहाँ चेतन धीरे-धीरे असीम में लय हो रहा था।
मैंने तुम्हें देखा वैसे ही,
जैसे कोई पथिक
अंतिम बार अस्त होते हुए नक्षत्र को निहारता है।
क्या मैं रुदन कर रहा था?
नहीं! तुम तो जानती हो,
वेदना रोती नहीं
वह तो अंतर्मन में वैसे ही भीगती है
जैसे रजनी की नीरवता में ओस से वन-वीथिकाएँ भीग जाती हैं।
उस क्षण मुझे बोध हुआ
मोक्ष केवल जड़ता से मुक्ति नहीं,
मोक्ष तो तुम्हें असीम की ओर जाते हुए देखना है,
बिना किसी प्रतिबन्ध के,
बिना किसी मोह-तंतु के!
तुमने मुझे मौन विदा दी
बिना किसी कलरव के,
बिना एक भी संशयात्मक 'ठहरो' के!
और इसी निशब्द विसर्जन में छिपा था मेरा चरम अनुराग,
मेरा अंतिम मोक्ष...
मेरा हृदय-वृक्ष...
मेरी सहोदरा!
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'