कहने को बहुत कुछ है !
पर कैसे कहूं ?
पता नही तुम समझ पाओगे या नही,
जो मैं महसूस करती हूँ ।
दूरियों का एहसास मुझे डराता है,
धमकाता है
और तोड़ने का प्रयास करता है,
पर मुझे मंजूर नही है,
यूँ टूट जाना
और टूटकर बिखर जाना ।
जानती हूँ
अभी तुम्हारे पास वक़्त नही है,
पर तुम्हारी आँखों में देखा है,
मैंने मेरी फिक्र,
जो तुम करते हो हर वक़्त
पर कहते नही कभी
मुझसे न किसी और से।
वक़्त से मुझे कुछ मिले ना मिले,
पर मैंने खुद को पा लिया है,
तुममें ।
यही मेरी प्रेरणा है,
यही मेरी ताकत है ।
पर कैसे कहूं ?
पता नही तुम समझ पाओगे या नही,
जो मैं महसूस करती हूँ ।
दूरियों का एहसास मुझे डराता है,
धमकाता है
और तोड़ने का प्रयास करता है,
पर मुझे मंजूर नही है,
यूँ टूट जाना
और टूटकर बिखर जाना ।
जानती हूँ
अभी तुम्हारे पास वक़्त नही है,
पर तुम्हारी आँखों में देखा है,
मैंने मेरी फिक्र,
जो तुम करते हो हर वक़्त
पर कहते नही कभी
मुझसे न किसी और से।
वक़्त से मुझे कुछ मिले ना मिले,
पर मैंने खुद को पा लिया है,
तुममें ।
यही मेरी प्रेरणा है,
यही मेरी ताकत है ।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
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