टूट गया मन का एक तारा
प्रिये, तुम्हारे जाने से।
जैसे किसी रात ने
अपने ही चाँद को खो दिया हो।
मैं अब भी गाता हूँ —
वही राग, वही धुनें,
पर हर स्वर के पीछे
तुम्हारी चुप्पी बैठी होती है।
गीत वही हैं,
जो तुमने सिखाए थे
मुस्कराकर, आँखों से —
पर अब
वे सिर्फ़ शब्द रह गए हैं
जिन्हें गा तो सकता हूँ
पर जी नहीं सकता।
तुम्हारे जाने के बाद
संगीत अधूरा नहीं हुआ —
बस
मेरा दिल
उसे पूरा मानने से इंकार करता है।
अब हर गाना
एक ख़ामोश चीख़ है,
हर तान
एक टूटा हुआ स्पर्श।
तुम थी तो सुर था,
अब सुर है —
पर तुम नहीं।
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