Saturday, June 21, 2025

जीविता

अभी तो मैंने जन्म लिया था
अभी से इतनी पीड़ा
अभी तो ठीक से रोई भी नही
माँ को देखा नही
माँ के आँचल में सोई भी नही
न अठखेली, न किलकारी
न चिहुंकी,न ही कोई क्रीड़ा
अभी से इतनी पीड़ा।

तन गौर से श्वेत 
फिर श्वेत से नीला होता हुआ
तोड़ रहा है मेरे अपनों की उम्मीद
यंत्रो में जकड़ रखा है
चुभोई हैं सुईंया नसों में
ताकि बचा सके मुझे
पर किससे ?
क्या वो जिसे मृत्य कहते है
वो मुझे ले जाना चाहती है
पर क्यों ! किसलिए ?
मैं नवजात भला किस काम आऊँगी
अभी तो मैंने देखा ही नही
जीवन का विस्तार
अनोखा जगत
सृष्टि का व्यवहार।
ठहरो
हे मृत्यु ! नही ले जा सकती
तुम मुझे
मेरी माँ का विश्वास 
और पिता की उम्मीद 
तुम्हारी राह में तनकर खड़ा है
अभी तुम्हारा वक़्त नही है
तुम्हारे संकल्प से मेरा हौसला बड़ा है।
कतरा कतरा प्राण समेट
पीड़ा का हलाहल पी चुकी हूँ
मैं तुझे हराकर जी उठी हूँ।
क्या कहा ! आखिर कौन हूँ मैं ?
पिता की संजीवित,
सुचित, अपराजित गर्विता
मैं हूँ अपनी माँ की जीविता
हाँ ! मैं हूँ अपनी माँ की जीविता।

             -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

No comments:

Post a Comment

मैं चुपके से तुझे अपना बना के रखती हूँ

 छुपा के ग़म मैं खुद को यूँ सजा के रखती हूँ  बस इस तरह से तुझसे दिल लगा के रखती हूँ तुझे न छू सके ये अश्क, ये दुनिया की रुस्वाई  तभी तो खुद ...