लगता नहीं
कि तू कहीं गई है।
दरवाज़ा अब भी
तेरी आहट से चौंकता है।
खिड़की पर धूप
वैसे ही बैठी रहती है
जैसे तुझे देखने आई हो।
चाय का प्याला
अब भी दो रखा जाता है,
एक पी लेती है तन्हाई,
एक रह जाता है —
तेरे हिस्से की चुप्पी बनकर।
घड़ी चलती है,
दिन बदलते हैं,
पर ज़िंदगी...
जहाँ थी
वहीं है।
तेरे जाने के बाद
सब कुछ थम तो नहीं गया,
पर
कुछ भी चल नहीं रहा।
No comments:
Post a Comment