Monday, June 23, 2025

तुम कविता की आत्मा हो

यद्यपि तुम जा चुकी हो इस दुनिया से,
फिर भी हर शब्द तुम्हारा एहसास कराता है।
तुम्हारी हँसी, तुम्हारा मौन,
हर पंक्ति में सजीव हो उठता है।

जब पढ़ता हूँ किसी कवियत्री की कविता,
हर शब्द में तुम्हारा नाम झलकता है।
पीड़ा की व्यथा जब बहती है पंक्तियों में,
तुम्हारी आँखों की नमी उसमें चमकती है।

तुम मुस्कुराती हो अब भी,
कविता की लय में, 
उसकी छाया में।
तुम्हारी आत्मा अब बसती है
शब्दों के उस कोमल घर में 
कविता में।

तुम कहीं गई नहीं हो,
तुम्हारी सांसें अब मेरे छंदों में हैं।
जब मैं चुपचाप कोई गीत लिखता हूँ,
तुम्हारी स्याही मेरी कलम में बहती है।

तुम बात करती हो अब भी 
फूलों की, पंछियों की, सपनों की।
ऋतुओं की रुनझुन में तुम बोल उठती हो,
और स्त्रियों की पुकार में गरज बन जाती हो।

तुम हक की आवाज़ बन गई हो,
जो हर बेड़ी को तोड़ने चली है।
तुम नारी की चेतना बन गई हो,
जो हर आँसू को कविता में ढालती है।

तुम कविता नहीं, 
कविता की आत्मा हो।
तुम सृजन नहीं, 
सृजन का कारण हो।
अब तुम सिर्फ स्मृति नहीं,
अब तुम शाश्वत हो —
हर उस कविता में जो सच बोलती है,
जो प्रेम की तरह जीती है,
और तुम्हारे नाम पर समाप्त होती है।

तुम हो कविता में अब भी,
तुम हो धड़कन की भाषा।
तुम हो अंत नहीं,
तुम हो अमर अभिलाषा।

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