Saturday, April 18, 2026

पराजित नहीं है अपराजिता

अश्कों से बहती है यादों की सरिता,
पराजित नहीं है अपराजिता।
दर्द की हर काली रात के बाद,
उम्मीद की भोर है अपराजिता। 
पराजित नहीं है अपराजिता।

काग़ज़ पे चुपके से अपने वो, 
सपनों के फूल सजाती थी,
शब्दों की छोटी नाव लिए, 
मन के समंदर जाती थी।
सखियों की हँसी में बसती थी, 
वो घर की पावन ज्योति थी,
जिस राह से वो गुज़रती थी, 
वो राह भी हँसती होती थी।

जब दर्द ने बाहें फैलाईं, 
और साँसें भी थकने लगीं,
मुस्कान की लौ थामे तब भी, 
हर पल जली थी अपराजिता।
पराजित नहीं है अपराजिता।

रातों की लंबी खामोशी में, 
उम्मीद का दीप जलाया था,
हर आँसू को इक गीत बना, 
जीने का अर्थ सिखाया था।
तन काँटों के घेरे में था, 
पर मन का खुला आकाश रहा,
सत्ताइस बरसों की उम्र में, 
हिम्मत का नया इतिहास रहा।
किस्मत से हार नहीं मानी, 
जब तक चली थी अपराजिता।
पराजित नहीं है अपराजिता।

अब दूर कहीं वो तारा है, 
पर दिल से कभी न दूर हुई,
उसकी हिम्मत की रौशनी, 
यादों में सदा भरपूर हुई।
जब भी अँधेरा घिर आए, 
उसका ही नाम याद आता है,
जैसे कोई बुझती राहों में, 
फिर दीप जलाकर जाता है।
कुछ लोग चले भी जाते हैं, 
पर अंत नहीं कहलाते हैं...
मिटकर भी जो है अमर सदा, 
वो है अजेय अपराजिता!

पराजित नहीं है अपराजिता...
पराजित नहीं है अपराजिता।

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