पराजित नहीं है अपराजिता।
दर्द की हर काली रात के बाद
उम्मीद की भोर है अपराजिता।
पराजित नहीं है…
पराजित नहीं है अपराजिता।
काग़ज़ पर चुपके से अपने
सपनों के फूल सजाती थी,
शब्दों की छोटी नाव लिए
मन के समंदर जाती थी।
सखियों की हँसी में बसती,
घर की रौशनी लगती थी,
जिस राह से वो गुज़र जाती
वो राह भी हँसती लगती थी।
जब दर्द ने बाँहें फैलाईं
और साँसें भी थकने लगीं,
मुस्कान की लौ थामे फिर भी
हर पल जली थी अपराजिता।
रातों की लंबी खामोशी में
उम्मीद का दीप जलाया,
हर आँसू को गीत बना कर
जीने का अर्थ सिखाया।
तन जैसे काँटों से घिरा था
पर मन का आकाश खुला,
छोटी सी उम्र में उसने
हिम्मत का अर्थ लिखा।
पच्चीस बरसों की उस लौ में
एक उम्र छिपी थी जैसे,
किस्मत से हार नहीं मानी
जब तक चली थी अपराजिता।
अब दूर कहीं वो तारा है
पर दिल से दूर नहीं है,
उसकी हिम्मत की रौशनी
इस जीवन में कम नहीं है।
जब भी अँधेरा घिर आए
उसका नाम याद आता है,
जैसे टूटी राहों को फिर
कोई दीप दिखाता है।
कुछ लोग चले भी जाते हैं
पर हार नहीं कहलाते,
हर दिल में जीती रहती है
जो सच में जीती अपराजिता।