रत्न-जवाहर लूट गए,
मुस्कानों के मोती नयन से
झर-झर करके छूट गए।
सुख के पौधे रोपे जब
और आँखों का नीर दिया,
भँवरे रूठे, तितली रूठी,
क्यारी,आँगन, घर रूठ गए।
जो हृदय के तहख़ाने में
आजीवन पाबंद हो गई—
पीड़ा, तू आनंद हो गई।
तृष्णाओं से युद्ध छेड़कर
मन को तहस-नहस कर डाला,
प्रणय-पर्व के शुभ मुहूर्त में
हिय में टूट गई वरमाला।
सब परिभाषाएँ बदल गईं,
पर अर्थ वही का वही रहा—
उसने देखा, तुमने माना,
किसी ने जाना पीकर प्याला।
शब्दों में मुखरित होने को
जिस क्षण से स्वच्छंद हो गई—
पीड़ा, तू आनंद हो गई।
आह हुई पाषाण हृदय में,
चीख मधुर संगीत बनी,
कतरा-कतरा टूट-टूट कर
जुड़ जाने की रीत बनी।
हार-हार कर हार गया जब
जीने की उम्मीदें भी,
सदैव साथ निभाने को फिर
योगेश्वर का गीत बनी।
पारिजात-सा खिल जाने को
आख़िर में सौगंध हो गई—
पीड़ा, तू आनंद हो गई।