Saturday, September 6, 2025

मुझसे बहस मत करो

तुम्हारे शब्द
शास्त्रों की गूंज जैसे हैं,
तर्कों की गहरी खाई में उतरते
पर मेरे हृदय तक नहीं पहुँचते।

तुम कहते हो—
समय का अर्थ यही है,
जीवन का सार वही है
जो तुम्हारे ज्ञान ने समझा।
पर मेरे लिए समय
घावों की तरह रिसता है,
और जीवन
बिना मरहम की पीड़ा सा जलता है।

तुम्हारी समझ
एक दीपक हो सकती है,
पर मेरी रातें
उस प्रकाश को स्वीकार नहीं करतीं।
क्योंकि मेरी आँखें
आँसुओं की नमी से भरी हैं,
और हर तर्क
मेरे लिए केवल
एक और बंधन बन जाता है।

ज्ञान की तुम्हारी वाणी
मेरे भीतर की करुणा को नहीं छूती,
मेरे अनुभव
तुम्हारी व्याख्याओं से परे हैं।
मेरी पीड़ा
किसी सूत्र से नहीं बंधी,
वह तो केवल
दिल की नीरव चीत्कार है।

तो मत दो मुझे तर्क,
मत दो उपदेश—
बस सुनो,
कि मेरे आँसुओं की भाषा
तुम्हारे ज्ञान से भी गहरी है।

और अंततः,
ओ मेरे मित्र,
मेरी थकी हुई आत्मा से विनय यही है—
मुझसे व्यर्थ का विवाद मत करो,
मुझसे बहस मत करो,
क्योंकि मेरी पीड़ा
तुम्हारे तर्कों से नहीं,
केवल मौन की करुणा से शांत होगी।

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