अपराजिता
तू खुदा है इसका मुझे ऐतबार है , तेरी बनाई हर शै से मुझको प्यार है, तू लाख ज़ख्म दे मुझे मार ही डाले न क्यों मैं ज़िन्दगी हूँ मौत से ग़म से कभी हारूंगी न।
Tuesday, February 24, 2026
मुक्ति के क्षण में
Wednesday, January 14, 2026
मैं चुपके से तुझे अपना बना के रखती हूँ
छुपा के ग़म मैं खुद को यूँ सजा के रखती हूँ
बस इस तरह से तुझसे दिल लगा के रखती हूँ
तुझे न छू सके ये अश्क, ये दुनिया की रुस्वाई
तभी तो खुद से भी तुझको बचा के रखती हूँ
ज़माना लाख चाहेगा कि हम राहें बदल डालें
मगर मैं अक्स तेरा दिल में बसा के रखती हूँ
कभी ख़्वाबों में मिलना और कभी नज़रों से बात करना
मैं अपनी बंदगी तुझमें समा के रखती हूँ
कठिन है राह लेकिन हौसला ये कम नहीं होता
तुझे पाऊँगी, ये उम्मीद जगा के रखती हूँ
न शोर-ओ-गुल, न वादे, न कोई रस्म दुनिया की
मैं चुपके से तुझे अपना बना के रखती हूँ
तुमसे प्रेम करती हूँ
कुचलने को इस अनुराग को,
तुम गए क्या संग तुम्हारे
मेरा मैं भी चला गया
जो मुझसे मुझको मिलाता था,
वह दर्पण भी धुंधला गया।
आस नहीं, विश्वास नहीं,
है जीवन का आभास नहीं,
ना लक्ष्य शेष, ना साहस ही,
अधरों पर शेष पिपास नहीं।
जो दीप प्रज्वलित था भीतर,
अंतर्मन को ही जला गया।
अधरों पर अब मुस्कान नहीं,
सब निकट खड़े पर दूर लगें,
निज की कोई पहचान नहीं।
जिस प्रेम में सकल जगत पाया,
वह प्रेम कहाँ अब चला गया।
अब अस्तित्व मेरा विस्मृत सा है,
जो प्राणों का आधार रहा,
वह केंद्र आज विक्षुब्ध सा है।
जिस स्वप्न ने सींचा था जीवन,
वह स्वप्न ही तृण सा बिखर गया।
उपवन की उस हरियाली को,
मैं खोज रहा अवशेषों में,
उस सांध्य गगन की लाली को।
जो सुर था मेरी धड़कन में,
वह मौन की चादर ओढ़ गया।
स्मृतियाँ बस पाथेय हुई,
अश्रुओं की इस सरिता में,
आशाएँ सब निस्तेज हुईं।
जिस राग से गुंजित था अंबर,
वह राग विराग में बदल गया।
Saturday, November 8, 2025
हिन्दी- भाषा की एक नदी
वह नदी है
जो भारतेंदु के शब्दों से निकलकर
भारत-भारती की घाटियों में गूँजती रही,
आवाज दी
"हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी।"
जिसके आँचल में
प्रेमचंद की गोदान की पीड़ा भी है
और गबन की विडंबना भी।
जहाँ किसान का पसीना
कहानी बन जाता है
और साधारण मनुष्य
इतिहास की धड़कन।
सरस्वती के पन्नों पर द्विवेदी का अनुशासन है,
जो बच्चों के कंठ में
स्वतंत्रता का शंख बनकर फूटता है
"झाँसी की रानी।"
आंदोलन उस जनमानस का
जो अपनी पहचान
मातृभाषा की गोद में खोजता है।
क्या मैं सिर्फ़ दफ़्तरों की राजभाषा हूँ,
जो चौपाल की मिट्टी से उठकर
संविधान सभा तक पहुँची थी,
कि यह भाषा हमें जोड़ सकती है।
जब कोई बालक
दिनकर के रसों को पढ़ेगा,
अपना ही चेहरा देखेगा,
कि हिंदी
सिर्फ़ बोली जाने वाली ध्वनि नहीं,
जहाँ भाषा मनुष्य को
उसकी जड़ों से मिलाती है।
कांति मुख पर कैसे लाऊँ
छल रहा है काल मुझको, काल को कैसे बताऊँ
घुल रहा है विष तन में, कांति
मुख पर कैसे लाऊँ।
पालकी मधुमालती की, द्वार
तक आती है प्रतिदिन
वेदना की देहरी पर, भय
से भर जाती है अनगिन
है शुभकामना अंतर्नयन की, हिय
में अनुराग जागे
किंतु पीड़ा की तपन, चीख
ठुकराती है अनुदिन।
विश्वास का दीपक बुझा, लौ
आस की कैसे जलाऊँ
घुल रहा है विष तन में, कांति
मुख पर कैसे लाऊँ।
प्रार्थना के शब्द खाली, इष्ट
ना जाने कहाँ हैं।
संकेत जिस पथ का मिला, शूल
पग पग पर वहाँ हैं।
अब है सशंकित आत्मा, इस
देह का उपक्रम न टूटे
श्वांस थमने सी लगी है, न
जाने जाना कहाँ है।
हो व्यथित जब मति भ्रमित, युक्ति
कोई कैसे लगाऊँ
घुल रहा है विष तन में, कांति
मुख पर कैसे लाऊँ।
Saturday, September 6, 2025
मुझसे बहस मत करो
मुक्ति के क्षण में
उस प्रलयंकारी विहान में, खड़ा था मैं एक मूक पाषाण सा, जहाँ मेरी करुणा, मेरा चिर-संचित भ्रातृ-स्नेह और उस श्मशान की धधकती चिता एक ही त्रिवेणी...
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यद्यपि तुम जा चुकी हो इस दुनिया से, फिर भी हर शब्द तुम्हारा एहसास कराता है। तुम्हारी हँसी, तुम्हारा मौन, हर पंक्ति में सजीव हो उठता है। जब प...
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ओ मेरी रानी तेरी कहानी तुझको सुनाऊंगा बातें बनाऊँगा आना तू फिर से आना तू फिर से भइया मै तेरा कन्हैया मै तेरा नाचूंगा गाऊंगा बंशी ...
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कहने को बहुत कुछ है ! पर कैसे कहूं ? पता नही तुम समझ पाओगे या नही, जो मैं महसूस करती हूँ । दूरियों का एहसास मुझे डराता है, धमकाता है औ...