Wednesday, January 14, 2026

मैं चुपके से तुझे अपना बना के रखती हूँ

 छुपा के ग़म मैं खुद को यूँ सजा के रखती हूँ 

बस इस तरह से तुझसे दिल लगा के रखती हूँ

तुझे न छू सके ये अश्क, ये दुनिया की रुस्वाई 

तभी तो खुद से भी तुझको बचा के रखती हूँ

ज़माना लाख चाहेगा कि हम राहें बदल डालें 

मगर मैं अक्स तेरा दिल में  बसा के रखती हूँ

कभी ख़्वाबों में मिलना और कभी नज़रों से बात करना 

मैं अपनी बंदगी तुझमें समा के रखती हूँ

कठिन है राह लेकिन हौसला ये कम नहीं होता 

तुझे पाऊँगी, ये उम्मीद जगा के रखती हूँ

न शोर-ओ-गुल, न वादे, न कोई रस्म दुनिया की 

मैं चुपके से तुझे अपना बना के रखती हूँ

तुमसे प्रेम करती हूँ

अलंकरण की ओट में, 
अवसाद अपना गोपन करती हूँ, 
तुझे न कोई पीड़ा छुए, 
बस इसीलिए सजती-संवरती हूँ। 
न घोषणा है प्रेम की, 
न अनुबंधों का कोई बंधन है, 
मैं मौन के एकांत में, 
बस तेरा वंदन करती हूँ।

मेरे इन नयनों के नीर में, 
तेरा प्रतिबिंब न ढल जाए, 
मेरी व्यथा की आंच से, 
सुकोमल मन न जल जाए। 
समाज की वर्जनाएँ हैं, 
डगर भी अति दुर्गम है, 
किन्तु तेरे साथ होने से, 
बाधा कुसुमित और सुगम है। 
नयनों की कोरों से, 
स्वप्नों के वातायन में, 
मैं अदृश्य सी प्रार्थना बन, 
तुझसे भेंट करती हूँ।

कुचलने को इस अनुराग को, 
सहस्रों यत्न होंगे, 
तोड़ने को आत्मिक सेतु, 
कठिन प्रतिबंध होंगे। 
पर अडिग है जो संकल्प मेरा, 
वही मेरा संबल है, 
बिना तेरे ये जीवन, 
रिक्त और मरुस्थल है। 
न कोलाहल है अधरों पर, 
न कोई वचन माँगा है, 
मैंने अपनी साँसों को, 
बस तेरे नाम से टाँगा है।

ये जो श्रृंगार है मेरा, 
ये मात्र एक आवरण है, 
इन्हीं के पीछे छिपे हुए, 
मेरे अश्रु और मरण हैं। 
तुझे जग की कुदृष्टि से, 
सदैव बचा के रखती हूँ, 
स्वयं को विस्मृत करके, 
तुझे स्वयं में रखती हूँ। 
मैं मौन की सरिता बनकर, 
तुझमें विलीन होती हूँ, 
मैं अपनी ही मर्यादा में, 
बस तुमसे प्यार करती हूँ।

तुम गए क्या संग तुम्हारे

तुम गए क्या संग तुम्हारे
मेरा मैं भी चला गया
जो मुझसे मुझको मिलाता था,
वह दर्पण भी धुंधला गया।

​आस नहीं, विश्वास नहीं,
है जीवन का आभास नहीं,
ना लक्ष्य शेष, ना साहस ही,
अधरों पर शेष पिपास नहीं।
जो दीप प्रज्वलित था भीतर,
अंतर्मन को ही जला गया।

​है स्पंदन पर प्राण नहीं,
अधरों पर अब मुस्कान नहीं,
सब निकट खड़े पर दूर लगें,
निज की कोई पहचान नहीं।
जिस प्रेम में सकल जगत पाया,
वह प्रेम कहाँ अब चला गया।

​था बोध मुझे निज सत्ता का,
अब अस्तित्व मेरा विस्मृत सा है,
जो प्राणों का आधार रहा,
वह केंद्र आज विक्षुब्ध सा है।
जिस स्वप्न ने सींचा था जीवन,
वह स्वप्न ही तृण सा बिखर गया।

​मुरझाए पुष्पों में ढूँढूँ,
उपवन की उस हरियाली को,
मैं खोज रहा अवशेषों में,
उस सांध्य गगन की लाली को।
जो सुर था मेरी धड़कन में,
वह मौन की चादर ओढ़ गया।

​है काल चक्र की गति निष्ठुर,
स्मृतियाँ बस पाथेय हुई,
अश्रुओं की इस सरिता में,
आशाएँ सब निस्तेज हुईं।
जिस राग से गुंजित था अंबर,
वह राग विराग में बदल गया।

Saturday, November 8, 2025

हिन्दी- भाषा की एक नदी

 हिंदी
वह नदी है
जो भारतेंदु के शब्दों से निकलकर
भारत-भारती की घाटियों में गूँजती रही,
जहाँ मैथिलीशरण गुप्त ने
आवाज दी
"हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी।"
 
वह भाषा है
जिसके आँचल में
प्रेमचंद की गोदान की पीड़ा भी है
और गबन की विडंबना भी।
जहाँ किसान का पसीना
कहानी बन जाता है
और साधारण मनुष्य
इतिहास की धड़कन।
 
हिंदी
सरस्वती के पन्नों पर द्विवेदी का अनुशासन है,
दिनकर की ज्वाला है,
सुभद्राकुमारी चौहान का वह गीत है
जो बच्चों के कंठ में
स्वतंत्रता का शंख बनकर फूटता है
"झाँसी की रानी।"
 
भाषा यहाँ केवल शब्द नहीं,
बल्कि आंदोलन है
आंदोलन उस जनमानस का
जो अपनी पहचान
मातृभाषा की गोद में खोजता है।
 
आज भी हिंदी पूछती है
क्या मैं सिर्फ़ दफ़्तरों की राजभाषा हूँ,
या अब भी वही आत्मा
जो चौपाल की मिट्टी से उठकर
संविधान सभा तक पहुँची थी,
जहाँ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था
कि यह भाषा हमें जोड़ सकती है।
 
भविष्य में भी
जब कोई बालक
दिनकर के रसों को पढ़ेगा,
या कबीर के दोहे में
अपना ही चेहरा देखेगा,
तब यह स्पष्ट होगा
कि हिंदी
सिर्फ़ बोली जाने वाली ध्वनि नहीं,
बल्कि आत्मा की खोज है,
एक ऐसी यात्रा
जहाँ भाषा मनुष्य को
उसकी जड़ों से मिलाती है।

कांति मुख पर कैसे लाऊँ

छल रहा है काल मुझको, काल को कैसे बताऊँ

घुल रहा है विष तन में, कांति मुख पर कैसे लाऊँ।

 

पालकी मधुमालती की, द्वार तक आती है प्रतिदिन

वेदना की देहरी पर, भय से भर जाती है अनगिन

है शुभकामना अंतर्नयन की, हिय में अनुराग जागे

किंतु पीड़ा की तपन, चीख ठुकराती है अनुदिन।

 

विश्वास का दीपक बुझा, लौ आस की कैसे जलाऊँ

घुल रहा है विष तन में, कांति मुख पर कैसे लाऊँ।

 

प्रार्थना के शब्द खाली, इष्ट ना जाने कहाँ हैं।

संकेत जिस पथ का मिला, शूल पग पग पर वहाँ हैं।

अब है सशंकित आत्मा, इस देह का उपक्रम न टूटे

श्वांस थमने सी लगी है, न जाने जाना कहाँ है।

 

हो व्यथित जब मति भ्रमित, युक्ति कोई कैसे लगाऊँ

घुल रहा है विष तन में, कांति मुख पर कैसे लाऊँ।

Saturday, September 6, 2025

मुझसे बहस मत करो

तुम्हारे शब्द
शास्त्रों की गूंज जैसे हैं,
तर्कों की गहरी खाई में उतरते
पर मेरे हृदय तक नहीं पहुँचते।

तुम कहते हो—
समय का अर्थ यही है,
जीवन का सार वही है
जो तुम्हारे ज्ञान ने समझा।
पर मेरे लिए समय
घावों की तरह रिसता है,
और जीवन
बिना मरहम की पीड़ा सा जलता है।

तुम्हारी समझ
एक दीपक हो सकती है,
पर मेरी रातें
उस प्रकाश को स्वीकार नहीं करतीं।
क्योंकि मेरी आँखें
आँसुओं की नमी से भरी हैं,
और हर तर्क
मेरे लिए केवल
एक और बंधन बन जाता है।

ज्ञान की तुम्हारी वाणी
मेरे भीतर की करुणा को नहीं छूती,
मेरे अनुभव
तुम्हारी व्याख्याओं से परे हैं।
मेरी पीड़ा
किसी सूत्र से नहीं बंधी,
वह तो केवल
दिल की नीरव चीत्कार है।

तो मत दो मुझे तर्क,
मत दो उपदेश—
बस सुनो,
कि मेरे आँसुओं की भाषा
तुम्हारे ज्ञान से भी गहरी है।

और अंततः,
ओ मेरे मित्र,
मेरी थकी हुई आत्मा से विनय यही है—
मुझसे व्यर्थ का विवाद मत करो,
मुझसे बहस मत करो,
क्योंकि मेरी पीड़ा
तुम्हारे तर्कों से नहीं,
केवल मौन की करुणा से शांत होगी।

Thursday, June 26, 2025

अधूरे गीत

जाने कितने गीत लिखे,

नग़मे गाए जाने कितने —

हर एक में तुम थी,

हर एक में एक सपना था।


मैंने स्वर में सहेजा तुम्हें,

लफ़्ज़ों में छिपा लिया,

हर तान में रखा तुम्हारा नाम

जैसे कोई माला फेरता हो रोज़।


पर तुम...

न लौटे कभी।

न आवाज़ दी,

न किसी गीत का उत्तर आया।


गीत पूरे हुए

पर अर्थ अधूरे रह गए।

स्वप्न देखे

पर सुबह ने उन्हें छूने से इनकार कर दिया।


अब गीत हैं,

पर गायक चुप है।

अब स्वप्न हैं,

पर आँखें भीग जाती हैं।


जाने कितनी रातें जल गईं

इन रागों के दीप में,

पर तुम…

एक छाया बनकर भी न आई।


ना तुम वापस आए,

ना पूरे हो पाए सपने।

बस रह गए

काग़ज़ों पर कुछ नाम,

गले में अटका एक स्वर,

और दिल के कोने में

तुम।

मैं चुपके से तुझे अपना बना के रखती हूँ

 छुपा के ग़म मैं खुद को यूँ सजा के रखती हूँ  बस इस तरह से तुझसे दिल लगा के रखती हूँ तुझे न छू सके ये अश्क, ये दुनिया की रुस्वाई  तभी तो खुद ...