तुम गए क्या संग तुम्हारे
मेरा मैं भी चला गया
जो मुझसे मुझको मिलाता था,
वह दर्पण भी धुंधला गया।
मेरा मैं भी चला गया
जो मुझसे मुझको मिलाता था,
वह दर्पण भी धुंधला गया।
आस नहीं, विश्वास नहीं,
है जीवन का आभास नहीं,
ना लक्ष्य शेष, ना साहस ही,
अधरों पर शेष पिपास नहीं।
जो दीप प्रज्वलित था भीतर,
अंतर्मन को ही जला गया।
है स्पंदन पर प्राण नहीं,
अधरों पर अब मुस्कान नहीं,
सब निकट खड़े पर दूर लगें,
निज की कोई पहचान नहीं।
जिस प्रेम में सकल जगत पाया,
वह प्रेम कहाँ अब चला गया।
अधरों पर अब मुस्कान नहीं,
सब निकट खड़े पर दूर लगें,
निज की कोई पहचान नहीं।
जिस प्रेम में सकल जगत पाया,
वह प्रेम कहाँ अब चला गया।
था बोध मुझे निज सत्ता का,
अब अस्तित्व मेरा विस्मृत सा है,
जो प्राणों का आधार रहा,
वह केंद्र आज विक्षुब्ध सा है।
जिस स्वप्न ने सींचा था जीवन,
वह स्वप्न ही तृण सा बिखर गया।
अब अस्तित्व मेरा विस्मृत सा है,
जो प्राणों का आधार रहा,
वह केंद्र आज विक्षुब्ध सा है।
जिस स्वप्न ने सींचा था जीवन,
वह स्वप्न ही तृण सा बिखर गया।
मुरझाए पुष्पों में ढूँढूँ,
उपवन की उस हरियाली को,
मैं खोज रहा अवशेषों में,
उस सांध्य गगन की लाली को।
जो सुर था मेरी धड़कन में,
वह मौन की चादर ओढ़ गया।
उपवन की उस हरियाली को,
मैं खोज रहा अवशेषों में,
उस सांध्य गगन की लाली को।
जो सुर था मेरी धड़कन में,
वह मौन की चादर ओढ़ गया।
है काल चक्र की गति निष्ठुर,
स्मृतियाँ बस पाथेय हुई,
अश्रुओं की इस सरिता में,
आशाएँ सब निस्तेज हुईं।
जिस राग से गुंजित था अंबर,
वह राग विराग में बदल गया।
स्मृतियाँ बस पाथेय हुई,
अश्रुओं की इस सरिता में,
आशाएँ सब निस्तेज हुईं।
जिस राग से गुंजित था अंबर,
वह राग विराग में बदल गया।
No comments:
Post a Comment