अलंकरण की ओट में,
अवसाद अपना गोपन करती हूँ,
तुझे न कोई पीड़ा छुए,
बस इसीलिए सजती-संवरती हूँ।
न घोषणा है प्रेम की,
न अनुबंधों का कोई बंधन है,
मैं मौन के एकांत में,
बस तेरा वंदन करती हूँ।
मेरे इन नयनों के नीर में,
तेरा प्रतिबिंब न ढल जाए,
मेरी व्यथा की आंच से,
सुकोमल मन न जल जाए।
समाज की वर्जनाएँ हैं,
डगर भी अति दुर्गम है,
किन्तु तेरे साथ होने से,
बाधा कुसुमित और सुगम है।
नयनों की कोरों से,
स्वप्नों के वातायन में,
मैं अदृश्य सी प्रार्थना बन,
तुझसे भेंट करती हूँ।
कुचलने को इस अनुराग को,
सहस्रों यत्न होंगे,
तोड़ने को आत्मिक सेतु,
कठिन प्रतिबंध होंगे।
पर अडिग है जो संकल्प मेरा,
वही मेरा संबल है,
बिना तेरे ये जीवन,
रिक्त और मरुस्थल है।
न कोलाहल है अधरों पर,
न कोई वचन माँगा है,
मैंने अपनी साँसों को,
बस तेरे नाम से टाँगा है।
ये जो श्रृंगार है मेरा,
ये मात्र एक आवरण है,
इन्हीं के पीछे छिपे हुए,
मेरे अश्रु और मरण हैं।
तुझे जग की कुदृष्टि से,
सदैव बचा के रखती हूँ,
स्वयं को विस्मृत करके,
तुझे स्वयं में रखती हूँ।
मैं मौन की सरिता बनकर,
तुझमें विलीन होती हूँ,
मैं अपनी ही मर्यादा में,
बस तुमसे प्यार करती हूँ।
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