Wednesday, January 14, 2026

मैं चुपके से तुझे अपना बना के रखती हूँ

 छुपा के ग़म मैं खुद को यूँ सजा के रखती हूँ 

बस इस तरह से तुझसे दिल लगा के रखती हूँ

तुझे न छू सके ये अश्क, ये दुनिया की रुस्वाई 

तभी तो खुद से भी तुझको बचा के रखती हूँ

ज़माना लाख चाहेगा कि हम राहें बदल डालें 

मगर मैं अक्स तेरा दिल में  बसा के रखती हूँ

कभी ख़्वाबों में मिलना और कभी नज़रों से बात करना 

मैं अपनी बंदगी तुझमें समा के रखती हूँ

कठिन है राह लेकिन हौसला ये कम नहीं होता 

तुझे पाऊँगी, ये उम्मीद जगा के रखती हूँ

न शोर-ओ-गुल, न वादे, न कोई रस्म दुनिया की 

मैं चुपके से तुझे अपना बना के रखती हूँ

No comments:

Post a Comment

मुक्ति के क्षण में

उस प्रलयंकारी विहान में, खड़ा था मैं एक मूक पाषाण सा, जहाँ मेरी करुणा,  मेरा चिर-संचित भ्रातृ-स्नेह और उस श्मशान की धधकती चिता एक ही त्रिवेणी...