वह नदी है
जो भारतेंदु के शब्दों से निकलकर
भारत-भारती की घाटियों में गूँजती रही,
आवाज दी
"हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी।"
जिसके आँचल में
प्रेमचंद की गोदान की पीड़ा भी है
और गबन की विडंबना भी।
जहाँ किसान का पसीना
कहानी बन जाता है
और साधारण मनुष्य
इतिहास की धड़कन।
सरस्वती के पन्नों पर द्विवेदी का अनुशासन है,
जो बच्चों के कंठ में
स्वतंत्रता का शंख बनकर फूटता है
"झाँसी की रानी।"
आंदोलन उस जनमानस का
जो अपनी पहचान
मातृभाषा की गोद में खोजता है।
क्या मैं सिर्फ़ दफ़्तरों की राजभाषा हूँ,
जो चौपाल की मिट्टी से उठकर
संविधान सभा तक पहुँची थी,
कि यह भाषा हमें जोड़ सकती है।
जब कोई बालक
दिनकर के रसों को पढ़ेगा,
अपना ही चेहरा देखेगा,
कि हिंदी
सिर्फ़ बोली जाने वाली ध्वनि नहीं,
जहाँ भाषा मनुष्य को
उसकी जड़ों से मिलाती है।