आ जाओ, मेरी प्यारी बहना,
तुझसे बिछड़ कर नहीं मुझको रहना।
तुझ बिन अधूरी है जीवन की सरगम,
तू थी तो हर दिन था मधुर और शबनम।
बचपन की गूंजों में तेरी ही हँसी थी,
हर धड़कन में तेरी ही बंदिश बसी थी।
गीतों की माला का तू था वो गीत,
जिसे गुनगुनाने को रहता था प्रीत।
अब मन नहीं चाहता यूँ ही अकेला,
तेरे बिना फीका लगता है मेला।
राखी की डोरी, वो हँसी की कहानी,
तेरे बिना है अधूरी ज़िंदगानी।
सपनों की धरती, स्नेह का गगन,
बस तू ही तो थी मेरा अपनापन।
तो आ जा बहना, ये सावन बुलाए,
तेरे बिना मन भी सूना-सूना जाए।
तेरी हँसी फिर से खिल जाए घर में,
बन के घटा तू मेरे आँगन में छाए।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
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