Friday, September 6, 2024

छोटी बहन कहाँ है

बागों के फूल सारे
आंगन की सारी कलियां
गांवों के खेत पनघट, 
शहरों की चंद गलियां
गलियों में आती जाती
कुछ लड़कियों की टोली
हाथों में हाथ थामे 
करती हंसी ठिठोली
कमरे में कुछ किताबों पर
धूल की निशानी
सूखी कलम की स्याही
आधी लिखी कहानी
चौखट पे ये जो धुंधले, रंगोली के निशां हैं
भैया से पूछते हैं, छोटी बहन कहाँ है।

बचपन की वो शरारत 
झूलों की वो उड़ानें 
कागज़ की कश्तियों के 
खोए हुए ठिकाने 
अलमारी में सजे हैं 
कुछ रंग-बिरंगे धागे 
रातों को जागना वो 
सपनों के पीछे भागे 
तुलसी के कुछ दीयों में धुएँ के जो निशां हैं 
भैया से पूछते हैं, छोटी बहन कहाँ है।

सूरज से बात करती 
धरती की एक किरन
आंखों में जुगनुओं के
गीतों की अंजुमन
साहस के गीत रचकर
उम्मीद को बुलाती
दुख दर्द की घड़ी को
गा लोरियां सुलाती।
स्नेह की गीता सदा 
सिरहाने रख के सोती
जब सारा जहां सोता
जी भर के फिर वो रोती
बिस्तर की सिलवटों में, नमी के जो निशां हैं
भैया से पूछते हैं, छोटी बहन कहाँ हैं। 

अपने ग़म को तुमसे छुपा के रखती हूँ

बस ऐसे ही तुमसे मैं प्यार करती हूँ

अपने ग़म को
तुमसे छुपा के रखती हूँ,
इसलिए
ख़ुद को इतना सजा के रखती हूँ।

तुमसे जो हूँ,
तो मेरे आँसू भी तुम्हारे हो जाते —
इसलिए
हर घड़ी
ख़ुद से ही
तुमको बचा के रखती हूँ।

मोहब्बत को
रौंदने की कोशिशें हज़ार होंगी,
तुमसे
मुझे छुड़ाने को
बंदिशें बेहिसाब होंगी।

इसलिए
छुप-छुप के मुलाकात करती हूँ —
कभी निगाहों से,
कभी ख़्वाबों में,
कभी किसी ख़ामोश दुआ के बहाने।

मैं जानती हूँ —
ये रास्ता आसान नहीं,
पर ये भी जानती हूँ —
तुम हो, तो सब मुमकिन है।

इसलिए
ना शोर मचाया,
ना कोई वादा माँगा,
बस
ऐसे ही, चुपचाप,
तुमसे प्यार करती हूँ।

मैं चुपके से तुझे अपना बना के रखती हूँ

 छुपा के ग़म मैं खुद को यूँ सजा के रखती हूँ  बस इस तरह से तुझसे दिल लगा के रखती हूँ तुझे न छू सके ये अश्क, ये दुनिया की रुस्वाई  तभी तो खुद ...