Tuesday, May 27, 2025

कली की दास्ताँ

एक कड़वी हकीकत लिखी जाएगी
जब मेरी कहानी सुनी जाएगी।

अश्रुमय वेदना में ढली जाएगी
गीत पीड़ा के क्रंदन कली गाएगी

बाग ने सींच कर रूप यौवन दिया
बाग के ही द्वारा छली जाएगी।

संग भ्रमर का मिला पर नियति का नही
हिय से छूटकर किस गली जाएगी।

करती शिकवा नही बाग से कुछ कभी
मन के भीतर ही भीतर जली जाएगी।

ईश करते नहीं गलतियां आस थी
टूटा विश्वास कैसे खिली जाएगी।

श्वांस में प्राण भर मुस्कुराती हुई
बांटती फिर भी खुशी जाएगी।

हे विधाता रचो न ऐसी तकदीर कोई
विनती करती जहां से चली जायेगी।

Sunday, May 18, 2025

कितना कुछ

कितना कुछ कहना होता है

चंद्रलोक की रश्मि सुधा में
खामोशी में पर बहुधा में
जीवन की बिरुदावली गाते
अश्रु पटल से छलके जाते
शब्दों के सागर विप्लव को
आखिर जब रुकना होता है
कितना कुछ कहना होता है।

तू खामोश हुई है जब से
मैं रोता हूँ खुद में छुप के
अंतर्मन को है झुलसाती
आह हृदय से दूर न जाती
पीड़ा की चादर ताने जब
दुख के पल सहना होता है
कितना कुछ कहना होता है।

हाँ जो मेरी हार हुई है 
तुमको न स्वीकार हुई है
मैं हारा जो तू हारी है
सच इतना ही अतिभारी है
आँख मिलाकर तुझसे जब
उठकर आगे बढ़ना होता है
कितना कुछ कहना होता है।

जीवन में आनंद उतारे
गूंज उठे हैं गीत तुम्हारे
उम्मीदों की धूप खिली है
नवदृष्टि नवरूप मिली है
आशीष लिए जीवन पथ पर
जब मंद मधुर बहना होता है
कितना कुछ कहना होता है।

मुक्ति के क्षण में

उस प्रलयंकारी विहान में, खड़ा था मैं एक मूक पाषाण सा, जहाँ मेरी करुणा,  मेरा चिर-संचित भ्रातृ-स्नेह और उस श्मशान की धधकती चिता एक ही त्रिवेणी...