कितना कुछ कहना होता है
चंद्रलोक की रश्मि सुधा में
खामोशी में पर बहुधा में
जीवन की बिरुदावली गाते
अश्रु पटल से छलके जाते
शब्दों के सागर विप्लव को
आखिर जब रुकना होता है
कितना कुछ कहना होता है।
तू खामोश हुई है जब से
मैं रोता हूँ खुद में छुप के
अंतर्मन को है झुलसाती
आह हृदय से दूर न जाती
पीड़ा की चादर ताने जब
दुख के पल सहना होता है
कितना कुछ कहना होता है।
हाँ जो मेरी हार हुई है
तुमको न स्वीकार हुई है
मैं हारा जो तू हारी है
सच इतना ही अतिभारी है
आँख मिलाकर तुझसे जब
उठकर आगे बढ़ना होता है
कितना कुछ कहना होता है।
जीवन में आनंद उतारे
गूंज उठे हैं गीत तुम्हारे
उम्मीदों की धूप खिली है
नवदृष्टि नवरूप मिली है
आशीष लिए जीवन पथ पर
जब मंद मधुर बहना होता है
कितना कुछ कहना होता है।
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