Friday, May 1, 2020

आखिर तुम गीतों में आए

स्वप्नों की पगडंडी छोड़
विरह कुंज से नाता तोड़,
शब्द सुरभि चितराग भव
मधुर मंद मधुमय मुस्काये।
आखिर तुम गीतों में आए।
सावन की रिमझिम फुहार में
पपीहे की पहली पुकार में,
ऊंच नीच की बाते छोड़
वर्षों का मौन व्रत तोड़
अपनेपन के बोल सुनाए।
आखिर तुम गीतों में आए।
एक पहेली सा जीवन है
ना जाने कितनी उलझन है,
कहने वालों से मुँह मोड़
उम्मीदों से रिश्ता जोड़
मेरी हर उलझन सुलझाए।
आखिर तुम गीतों में आए।
शाख पे आया क्यों न फूल
मुझे याद है मेरी भूल
प्रेम नीर का अनुक्रम टूटा
सहानुभूति से रहा अछूता
सारे शिकवे गिले भुलाए।
आखिर तुम गीतों में आए।

No comments:

Post a Comment

पीड़ा तू आनंद हो गई

खुशियों के बक्से से सारे रत्न-जवाहर लूट गए, मुस्कानों के मोती नयन से झर-झर करके छूट गए। सुख के पौधे रोपे जब और आँखों का नीर दिया, भँवरे रूठे...