लिखने से
कम नही होती है
मेरी पीड़ा
फिर भी लिखती हूँ
शब्दों में बांध कर रख देती हूँ
पन्नों के बीच हिफाजत से।
तू खुदा है इसका मुझे ऐतबार है , तेरी बनाई हर शै से मुझको प्यार है, तू लाख ज़ख्म दे मुझे मार ही डाले न क्यों मैं ज़िन्दगी हूँ मौत से ग़म से कभी हारूंगी न।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
पीड़ा तू आनंद हो गई
खुशियों के बक्से से सारे रत्न-जवाहर लूट गए, मुस्कानों के मोती नयन से झर-झर करके छूट गए। सुख के पौधे रोपे जब और आँखों का नीर दिया, भँवरे रूठे...
-
तुम्हारे शब्द शास्त्रों की गूंज जैसे हैं, तर्कों की गहरी खाई में उतरते पर मेरे हृदय तक नहीं पहुँचते। तुम कहते हो— समय का अर्थ यही है, जीवन क...
-
उस प्रलयंकारी विहान में, खड़ा था मैं एक मूक पाषाण सा, जहाँ मेरी करुणा, मेरा चिर-संचित भ्रातृ-स्नेह और उस श्मशान की धधकती चिता एक ही त्रिवेणी...
-
कहने को बहुत कुछ है ! पर कैसे कहूं ? पता नही तुम समझ पाओगे या नही, जो मैं महसूस करती हूँ । दूरियों का एहसास मुझे डराता है, धमकाता है औ...
No comments:
Post a Comment