Tuesday, February 24, 2026

मुक्ति के क्षण में

उस प्रलयंकारी विहान में,
खड़ा था मैं
एक मूक पाषाण सा,
जहाँ मेरी करुणा, 
मेरा चिर-संचित भ्रातृ-स्नेह
और उस श्मशान की धधकती चिता
एक ही त्रिवेणी में विलीन हो रहे थे।

​तुम वहाँ थी
अग्नि की उन स्वर्ण-रश्मियों के झुरमुट में,
बिल्कुल वैसी ही, 
जैसी स्मृति के प्रथम वातायन में खिली थी!
अधरों पर वही चिर-परिचित मृदु हास,
और नयनों में वही मौन उलाहना
मानो पूछ रही हो, 
"क्या इस महायात्रा में तुम संग न चलोगे?"
तुम्हारी उस निस्तब्धता में एक अलौकिक तृप्ति थी,
जैसे आत्मा को अंततः अपनी मरु-मरीचिका का तट मिल गया हो।
​तटिनी की शीतल लहरों ने मेरे चरण पखारे,
मानो जल के अक्षरों में कोई निगूढ़ प्रश्न अंकित किया हो
"क्या तुमने मोह के समस्त पाश काट दिए हैं?"
और मैंने मस्तक झुका दिया
हाँ! तुम्हारे रक्षा-सूत्र की वह अंतिम ऊष्मा,
तुम्हारी निश्छल हंसी की वह स्वर्णिम धूप,
सब कुछ इस चिता की प्रदीप्त ज्वाला को सौंप आया हूँ।

​तुम स्थिर थी वहाँ
जहाँ चेतन धीरे-धीरे असीम में लय हो रहा था।
मैंने तुम्हें देखा वैसे ही, 
जैसे कोई पथिक
अंतिम बार अस्त होते हुए नक्षत्र को निहारता है।
क्या मैं रुदन कर रहा था?
नहीं! तुम तो जानती हो, 
वेदना रोती नहीं
वह तो अंतर्मन में वैसे ही भीगती है
जैसे रजनी की नीरवता में ओस से वन-वीथिकाएँ भीग जाती हैं।

​उस क्षण मुझे बोध हुआ
मोक्ष केवल जड़ता से मुक्ति नहीं,
मोक्ष तो तुम्हें असीम की ओर जाते हुए देखना है,
बिना किसी प्रतिबन्ध के, 
बिना किसी मोह-तंतु के!
​तुमने मुझे मौन विदा दी
बिना किसी कलरव के, 
बिना एक भी संशयात्मक 'ठहरो' के!
और इसी निशब्द विसर्जन में छिपा था मेरा चरम अनुराग,
मेरा अंतिम मोक्ष... 
मेरा हृदय-वृक्ष... 
मेरी सहोदरा!

   -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

Wednesday, January 14, 2026

मैं चुपके से तुझे अपना बना के रखती हूँ

 छुपा के ग़म मैं खुद को यूँ सजा के रखती हूँ 

बस इस तरह से तुझसे दिल लगा के रखती हूँ

तुझे न छू सके ये अश्क, ये दुनिया की रुस्वाई 

तभी तो खुद से भी तुझको बचा के रखती हूँ

ज़माना लाख चाहेगा कि हम राहें बदल डालें 

मगर मैं अक्स तेरा दिल में  बसा के रखती हूँ

कभी ख़्वाबों में मिलना और कभी नज़रों से बात करना 

मैं अपनी बंदगी तुझमें समा के रखती हूँ

कठिन है राह लेकिन हौसला ये कम नहीं होता 

तुझे पाऊँगी, ये उम्मीद जगा के रखती हूँ

न शोर-ओ-गुल, न वादे, न कोई रस्म दुनिया की 

मैं चुपके से तुझे अपना बना के रखती हूँ

तुमसे प्रेम करती हूँ

अलंकरण की ओट में, 
अवसाद अपना गोपन करती हूँ, 
तुझे न कोई पीड़ा छुए, 
बस इसीलिए सजती-संवरती हूँ। 
न घोषणा है प्रेम की, 
न अनुबंधों का कोई बंधन है, 
मैं मौन के एकांत में, 
बस तेरा वंदन करती हूँ।

मेरे इन नयनों के नीर में, 
तेरा प्रतिबिंब न ढल जाए, 
मेरी व्यथा की आंच से, 
सुकोमल मन न जल जाए। 
समाज की वर्जनाएँ हैं, 
डगर भी अति दुर्गम है, 
किन्तु तेरे साथ होने से, 
बाधा कुसुमित और सुगम है। 
नयनों की कोरों से, 
स्वप्नों के वातायन में, 
मैं अदृश्य सी प्रार्थना बन, 
तुझसे भेंट करती हूँ।

कुचलने को इस अनुराग को, 
सहस्रों यत्न होंगे, 
तोड़ने को आत्मिक सेतु, 
कठिन प्रतिबंध होंगे। 
पर अडिग है जो संकल्प मेरा, 
वही मेरा संबल है, 
बिना तेरे ये जीवन, 
रिक्त और मरुस्थल है। 
न कोलाहल है अधरों पर, 
न कोई वचन माँगा है, 
मैंने अपनी साँसों को, 
बस तेरे नाम से टाँगा है।

ये जो श्रृंगार है मेरा, 
ये मात्र एक आवरण है, 
इन्हीं के पीछे छिपे हुए, 
मेरे अश्रु और मरण हैं। 
तुझे जग की कुदृष्टि से, 
सदैव बचा के रखती हूँ, 
स्वयं को विस्मृत करके, 
तुझे स्वयं में रखती हूँ। 
मैं मौन की सरिता बनकर, 
तुझमें विलीन होती हूँ, 
मैं अपनी ही मर्यादा में, 
बस तुमसे प्यार करती हूँ।

तुम गए क्या संग तुम्हारे

तुम गए क्या संग तुम्हारे
मेरा मैं भी चला गया
जो मुझसे मुझको मिलाता था,
वह दर्पण भी धुंधला गया।

​आस नहीं, विश्वास नहीं,
है जीवन का आभास नहीं,
ना लक्ष्य शेष, ना साहस ही,
अधरों पर शेष पिपास नहीं।
जो दीप प्रज्वलित था भीतर,
अंतर्मन को ही जला गया।

​है स्पंदन पर प्राण नहीं,
अधरों पर अब मुस्कान नहीं,
सब निकट खड़े पर दूर लगें,
निज की कोई पहचान नहीं।
जिस प्रेम में सकल जगत पाया,
वह प्रेम कहाँ अब चला गया।

​था बोध मुझे निज सत्ता का,
अब अस्तित्व मेरा विस्मृत सा है,
जो प्राणों का आधार रहा,
वह केंद्र आज विक्षुब्ध सा है।
जिस स्वप्न ने सींचा था जीवन,
वह स्वप्न ही तृण सा बिखर गया।

​मुरझाए पुष्पों में ढूँढूँ,
उपवन की उस हरियाली को,
मैं खोज रहा अवशेषों में,
उस सांध्य गगन की लाली को।
जो सुर था मेरी धड़कन में,
वह मौन की चादर ओढ़ गया।

​है काल चक्र की गति निष्ठुर,
स्मृतियाँ बस पाथेय हुई,
अश्रुओं की इस सरिता में,
आशाएँ सब निस्तेज हुईं।
जिस राग से गुंजित था अंबर,
वह राग विराग में बदल गया।

मुक्ति के क्षण में

उस प्रलयंकारी विहान में, खड़ा था मैं एक मूक पाषाण सा, जहाँ मेरी करुणा,  मेरा चिर-संचित भ्रातृ-स्नेह और उस श्मशान की धधकती चिता एक ही त्रिवेणी...