जाने कितने गीत लिखे,
नग़मे गाए जाने कितने —
हर एक में तुम थी,
हर एक में एक सपना था।
मैंने स्वर में सहेजा तुम्हें,
लफ़्ज़ों में छिपा लिया,
हर तान में रखा तुम्हारा नाम
जैसे कोई माला फेरता हो रोज़।
पर तुम...
न लौटे कभी।
न आवाज़ दी,
न किसी गीत का उत्तर आया।
गीत पूरे हुए
पर अर्थ अधूरे रह गए।
स्वप्न देखे
पर सुबह ने उन्हें छूने से इनकार कर दिया।
अब गीत हैं,
पर गायक चुप है।
अब स्वप्न हैं,
पर आँखें भीग जाती हैं।
जाने कितनी रातें जल गईं
इन रागों के दीप में,
पर तुम…
एक छाया बनकर भी न आई।
ना तुम वापस आए,
ना पूरे हो पाए सपने।
बस रह गए
काग़ज़ों पर कुछ नाम,
गले में अटका एक स्वर,
और दिल के कोने में
तुम।