Saturday, November 8, 2025

हिन्दी- भाषा की एक नदी

 हिंदी
वह नदी है
जो भारतेंदु के शब्दों से निकलकर
भारत-भारती की घाटियों में गूँजती रही,
जहाँ मैथिलीशरण गुप्त ने
आवाज दी
"हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी।"
 
वह भाषा है
जिसके आँचल में
प्रेमचंद की गोदान की पीड़ा भी है
और गबन की विडंबना भी।
जहाँ किसान का पसीना
कहानी बन जाता है
और साधारण मनुष्य
इतिहास की धड़कन।
 
हिंदी
सरस्वती के पन्नों पर द्विवेदी का अनुशासन है,
दिनकर की ज्वाला है,
सुभद्राकुमारी चौहान का वह गीत है
जो बच्चों के कंठ में
स्वतंत्रता का शंख बनकर फूटता है
"झाँसी की रानी।"
 
भाषा यहाँ केवल शब्द नहीं,
बल्कि आंदोलन है
आंदोलन उस जनमानस का
जो अपनी पहचान
मातृभाषा की गोद में खोजता है।
 
आज भी हिंदी पूछती है
क्या मैं सिर्फ़ दफ़्तरों की राजभाषा हूँ,
या अब भी वही आत्मा
जो चौपाल की मिट्टी से उठकर
संविधान सभा तक पहुँची थी,
जहाँ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था
कि यह भाषा हमें जोड़ सकती है।
 
भविष्य में भी
जब कोई बालक
दिनकर के रसों को पढ़ेगा,
या कबीर के दोहे में
अपना ही चेहरा देखेगा,
तब यह स्पष्ट होगा
कि हिंदी
सिर्फ़ बोली जाने वाली ध्वनि नहीं,
बल्कि आत्मा की खोज है,
एक ऐसी यात्रा
जहाँ भाषा मनुष्य को
उसकी जड़ों से मिलाती है।

कांति मुख पर कैसे लाऊँ

छल रहा है काल मुझको, काल को कैसे बताऊँ

घुल रहा है विष तन में, कांति मुख पर कैसे लाऊँ।

 

पालकी मधुमालती की, द्वार तक आती है प्रतिदिन

वेदना की देहरी पर, भय से भर जाती है अनगिन

है शुभकामना अंतर्नयन की, हिय में अनुराग जागे

किंतु पीड़ा की तपन, चीख ठुकराती है अनुदिन।

 

विश्वास का दीपक बुझा, लौ आस की कैसे जलाऊँ

घुल रहा है विष तन में, कांति मुख पर कैसे लाऊँ।

 

प्रार्थना के शब्द खाली, इष्ट ना जाने कहाँ हैं।

संकेत जिस पथ का मिला, शूल पग पग पर वहाँ हैं।

अब है सशंकित आत्मा, इस देह का उपक्रम न टूटे

श्वांस थमने सी लगी है, न जाने जाना कहाँ है।

 

हो व्यथित जब मति भ्रमित, युक्ति कोई कैसे लगाऊँ

घुल रहा है विष तन में, कांति मुख पर कैसे लाऊँ।

Saturday, September 6, 2025

मुझसे बहस मत करो

तुम्हारे शब्द
शास्त्रों की गूंज जैसे हैं,
तर्कों की गहरी खाई में उतरते
पर मेरे हृदय तक नहीं पहुँचते।

तुम कहते हो—
समय का अर्थ यही है,
जीवन का सार वही है
जो तुम्हारे ज्ञान ने समझा।
पर मेरे लिए समय
घावों की तरह रिसता है,
और जीवन
बिना मरहम की पीड़ा सा जलता है।

तुम्हारी समझ
एक दीपक हो सकती है,
पर मेरी रातें
उस प्रकाश को स्वीकार नहीं करतीं।
क्योंकि मेरी आँखें
आँसुओं की नमी से भरी हैं,
और हर तर्क
मेरे लिए केवल
एक और बंधन बन जाता है।

ज्ञान की तुम्हारी वाणी
मेरे भीतर की करुणा को नहीं छूती,
मेरे अनुभव
तुम्हारी व्याख्याओं से परे हैं।
मेरी पीड़ा
किसी सूत्र से नहीं बंधी,
वह तो केवल
दिल की नीरव चीत्कार है।

तो मत दो मुझे तर्क,
मत दो उपदेश—
बस सुनो,
कि मेरे आँसुओं की भाषा
तुम्हारे ज्ञान से भी गहरी है।

और अंततः,
ओ मेरे मित्र,
मेरी थकी हुई आत्मा से विनय यही है—
मुझसे व्यर्थ का विवाद मत करो,
मुझसे बहस मत करो,
क्योंकि मेरी पीड़ा
तुम्हारे तर्कों से नहीं,
केवल मौन की करुणा से शांत होगी।

Thursday, June 26, 2025

अधूरे गीत

जाने कितने गीत लिखे,

नग़मे गाए जाने कितने —

हर एक में तुम थी,

हर एक में एक सपना था।


मैंने स्वर में सहेजा तुम्हें,

लफ़्ज़ों में छिपा लिया,

हर तान में रखा तुम्हारा नाम

जैसे कोई माला फेरता हो रोज़।


पर तुम...

न लौटे कभी।

न आवाज़ दी,

न किसी गीत का उत्तर आया।


गीत पूरे हुए

पर अर्थ अधूरे रह गए।

स्वप्न देखे

पर सुबह ने उन्हें छूने से इनकार कर दिया।


अब गीत हैं,

पर गायक चुप है।

अब स्वप्न हैं,

पर आँखें भीग जाती हैं।


जाने कितनी रातें जल गईं

इन रागों के दीप में,

पर तुम…

एक छाया बनकर भी न आई।


ना तुम वापस आए,

ना पूरे हो पाए सपने।

बस रह गए

काग़ज़ों पर कुछ नाम,

गले में अटका एक स्वर,

और दिल के कोने में

तुम।

तुम्हारे जाने से

टूट गया मन का एक तारा

प्रिये, तुम्हारे जाने से।

जैसे किसी रात ने

अपने ही चाँद को खो दिया हो।


मैं अब भी गाता हूँ —

वही राग, वही धुनें,

पर हर स्वर के पीछे

तुम्हारी चुप्पी बैठी होती है।


गीत वही हैं,

जो तुमने सिखाए थे

मुस्कराकर, आँखों से —

पर अब

वे सिर्फ़ शब्द रह गए हैं

जिन्हें गा तो सकता हूँ

पर जी नहीं सकता।


तुम्हारे जाने के बाद

संगीत अधूरा नहीं हुआ —

बस

मेरा दिल

उसे पूरा मानने से इंकार करता है।


अब हर गाना

एक ख़ामोश चीख़ है,

हर तान

एक टूटा हुआ स्पर्श।


तुम थी तो सुर था,

अब सुर है —

पर तुम नहीं।

तेरे जाने के बाद

 लगता नहीं

कि तू कहीं गई है।

दरवाज़ा अब भी

तेरी आहट से चौंकता है।

खिड़की पर धूप

वैसे ही बैठी रहती है

जैसे तुझे देखने आई हो।


चाय का प्याला

अब भी दो रखा जाता है,

एक पी लेती है तन्हाई,

एक रह जाता है —

तेरे हिस्से की चुप्पी बनकर।


घड़ी चलती है,

दिन बदलते हैं,

पर ज़िंदगी...

जहाँ थी

वहीं है।


तेरे जाने के बाद

सब कुछ थम तो नहीं गया,

पर

कुछ भी चल नहीं रहा।

Monday, June 23, 2025

तुम कविता की आत्मा हो

यद्यपि तुम जा चुकी हो इस दुनिया से,
फिर भी हर शब्द तुम्हारा एहसास कराता है।
तुम्हारी हँसी, तुम्हारा मौन,
हर पंक्ति में सजीव हो उठता है।

जब पढ़ता हूँ किसी कवियत्री की कविता,
हर शब्द में तुम्हारा नाम झलकता है।
पीड़ा की व्यथा जब बहती है पंक्तियों में,
तुम्हारी आँखों की नमी उसमें चमकती है।

तुम मुस्कुराती हो अब भी,
कविता की लय में, 
उसकी छाया में।
तुम्हारी आत्मा अब बसती है
शब्दों के उस कोमल घर में 
कविता में।

तुम कहीं गई नहीं हो,
तुम्हारी सांसें अब मेरे छंदों में हैं।
जब मैं चुपचाप कोई गीत लिखता हूँ,
तुम्हारी स्याही मेरी कलम में बहती है।

तुम बात करती हो अब भी 
फूलों की, पंछियों की, सपनों की।
ऋतुओं की रुनझुन में तुम बोल उठती हो,
और स्त्रियों की पुकार में गरज बन जाती हो।

तुम हक की आवाज़ बन गई हो,
जो हर बेड़ी को तोड़ने चली है।
तुम नारी की चेतना बन गई हो,
जो हर आँसू को कविता में ढालती है।

तुम कविता नहीं, 
कविता की आत्मा हो।
तुम सृजन नहीं, 
सृजन का कारण हो।
अब तुम सिर्फ स्मृति नहीं,
अब तुम शाश्वत हो —
हर उस कविता में जो सच बोलती है,
जो प्रेम की तरह जीती है,
और तुम्हारे नाम पर समाप्त होती है।

तुम हो कविता में अब भी,
तुम हो धड़कन की भाषा।
तुम हो अंत नहीं,
तुम हो अमर अभिलाषा।

Saturday, June 21, 2025

जीविता

अभी तो मैंने जन्म लिया था
अभी से इतनी पीड़ा
अभी तो ठीक से रोई भी नही
माँ को देखा नही
माँ के आँचल में सोई भी नही
न अठखेली, न किलकारी
न चिहुंकी,न ही कोई क्रीड़ा
अभी से इतनी पीड़ा।

तन गौर से श्वेत 
फिर श्वेत से नीला होता हुआ
तोड़ रहा है मेरे अपनों की उम्मीद
यंत्रो में जकड़ रखा है
चुभोई हैं सुईंया नसों में
ताकि बचा सके मुझे
पर किससे ?
क्या वो जिसे मृत्य कहते है
वो मुझे ले जाना चाहती है
पर क्यों ! किसलिए ?
मैं नवजात भला किस काम आऊँगी
अभी तो मैंने देखा ही नही
जीवन का विस्तार
अनोखा जगत
सृष्टि का व्यवहार।
ठहरो
हे मृत्यु ! नही ले जा सकती
तुम मुझे
मेरी माँ का विश्वास 
और पिता की उम्मीद 
तुम्हारी राह में तनकर खड़ा है
अभी तुम्हारा वक़्त नही है
तुम्हारे संकल्प से मेरा हौसला बड़ा है।
कतरा कतरा प्राण समेट
पीड़ा का हलाहल पी चुकी हूँ
मैं तुझे हराकर जी उठी हूँ।
क्या कहा ! आखिर कौन हूँ मैं ?
पिता की संजीवित,
सुचित, अपराजित गर्विता
मैं हूँ अपनी माँ की जीविता
हाँ ! मैं हूँ अपनी माँ की जीविता।

             -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

Thursday, June 19, 2025

यही मेरी ताकत है

कहने को बहुत कुछ है ! 
पर कैसे कहूं ? 
पता नही तुम समझ पाओगे या नही, 
जो मैं महसूस करती हूँ । 
दूरियों का एहसास मुझे डराता है, 
धमकाता है 
और तोड़ने का प्रयास करता है, 
पर मुझे मंजूर नही है,
 यूँ टूट जाना 
और टूटकर बिखर जाना । 
जानती हूँ 
अभी तुम्हारे पास वक़्त नही है, 
पर तुम्हारी आँखों में देखा है, 
मैंने मेरी फिक्र, 
जो तुम करते हो हर वक़्त 
पर कहते नही कभी 
मुझसे न किसी और से। 
वक़्त से मुझे कुछ मिले ना मिले, 
पर मैंने खुद को पा लिया है, 
तुममें । 
यही मेरी प्रेरणा है, 
यही मेरी ताकत है ।

        -देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

Tuesday, May 27, 2025

कली की दास्ताँ

एक कड़वी हकीकत लिखी जाएगी
जब मेरी कहानी सुनी जाएगी।

अश्रुमय वेदना में ढली जाएगी
गीत पीड़ा के क्रंदन कली गाएगी

बाग ने सींच कर रूप यौवन दिया
बाग के ही द्वारा छली जाएगी।

संग भ्रमर का मिला पर नियति का नही
हिय से छूटकर किस गली जाएगी।

करती शिकवा नही बाग से कुछ कभी
मन के भीतर ही भीतर जली जाएगी।

ईश करते नहीं गलतियां आस थी
टूटा विश्वास कैसे खिली जाएगी।

श्वांस में प्राण भर मुस्कुराती हुई
बांटती फिर भी खुशी जाएगी।

हे विधाता रचो न ऐसी तकदीर कोई
विनती करती जहां से चली जायेगी।

Sunday, May 18, 2025

कितना कुछ

कितना कुछ कहना होता है

चंद्रलोक की रश्मि सुधा में
खामोशी में पर बहुधा में
जीवन की बिरुदावली गाते
अश्रु पटल से छलके जाते
शब्दों के सागर विप्लव को
आखिर जब रुकना होता है
कितना कुछ कहना होता है।

तू खामोश हुई है जब से
मैं रोता हूँ खुद में छुप के
अंतर्मन को है झुलसाती
आह हृदय से दूर न जाती
पीड़ा की चादर ताने जब
दुख के पल सहना होता है
कितना कुछ कहना होता है।

हाँ जो मेरी हार हुई है 
तुमको न स्वीकार हुई है
मैं हारा जो तू हारी है
सच इतना ही अतिभारी है
आँख मिलाकर तुझसे जब
उठकर आगे बढ़ना होता है
कितना कुछ कहना होता है।

जीवन में आनंद उतारे
गूंज उठे हैं गीत तुम्हारे
उम्मीदों की धूप खिली है
नवदृष्टि नवरूप मिली है
आशीष लिए जीवन पथ पर
जब मंद मधुर बहना होता है
कितना कुछ कहना होता है।

मुक्ति के क्षण में

उस प्रलयंकारी विहान में, खड़ा था मैं एक मूक पाषाण सा, जहाँ मेरी करुणा,  मेरा चिर-संचित भ्रातृ-स्नेह और उस श्मशान की धधकती चिता एक ही त्रिवेणी...